Thursday, June 28, 2007

*****Dil Ki Kalam Se.......*********














Dil Ki Gehraiyon Ko Bayan Karne Ka Yeh Bhi Ek Alag Andazen Bayan Hai..........

Jo Dil ko Chuu Jata Hai, Aur Dil Ko Dil Se Mila Deta Hai........

Nacheez Ki Ek Chotti Se Koshish.....................




Na Hamari Gazlen Padha Karo, Na Hi Hum Pe Gazlen Likha Karo
Jo Utha Hai Daste Talab To Phir,Mere Haq Mein Bhi To Dua Karo.................

Woh Hai Be Wafa Hai Use Khaber,Mujhe Keh Raha Hai Wafa Karo
Yahi Mere Dil Ki Hai Aarzoo,Mere Saamne Hi Raha Karo.............

Shabe Roz Hai Tera Zikrr Ab,Kabhi Mera Bhi Tazkira Karo
Jo Hai Sang Sang Hi Rehne Do,Na Tarash Kar Ab Khuda Karo...............

Yahan Be Hayayi To Aam Hai,Zara Paas Sharm O Haya Karo
Kabhi Ungliyo Se Fizawon Mein,Mera Naam Yuon Na Likha Karo ..............

Na Hamari Gazlen Padha Karo,Na Hi Hum Pe Gazlen Likha Karo ..................

Thursday, June 21, 2007

******सिर्फ़ हम कहे*********























जब उन्होंने दाद दी तो इतना सिर्फ़ हम कहे

आप का करम कलम से आज अश्क हैं बहे,

है हमारे रुख पे नूर की झलक मिली उन्हें
वो क्या जानें उन के वास्ते हैं कितने गम सहे,

अश्क तो बहे मगर न आग को बुझा सके
ज़ाहिराना मुस्कराते दो बिचारे दिल दहे,


हम भी थे जवान आसमान में उड़े बहुत,
जब ज़मीन पर गिरे वो ख्वाब के महल ढहे,


लमहे आये हैं वो ज़िन्दगी में बारहा
जब लगा कि इस जहां में हम रहे कि न रहे !..................................

*****तनहाई का गम ************



मुझे जब उन का गम तनहाई में आ के सताता है

तभी ख्यालों में उन का चेहरा आ के मुस्कराता है,


जो मैं रातों को सोती हूं तो उन से दूर होती हूं

बज़रिए ख्वाब, पर दीदार उन का हो ही जाता है,


जो दिन में राह चलती हूं तो होता है गुमां मुझको

कि साया तैरता उन का हवा में साथ आता है


चमन-ओ-वादियों के बीच से जब भी गुज़रती हूं

हवा का झोंका उन की खुशबुओं को संग लाता है,


वो पोशीदा रहेंगे कब तलक मुझ से आखिर

न जाने जन्म का कितने हमारे बीच नाता है ! ...................

*****सितम******


किये हम ने उन पर करम कैसे कैसे

सहे हम ने उन के सितम कैसे कैसे,


उफ़ न किया न ज़ुबां हम ने खोली

किये उन ने हम पे ज़ुलम कैसे कैसे,


सच ही समझते रहे झूठ उन के

रखे हम ने दिल में भरम कैसे कैसे,


जिस ने दिये हैं उसे क्या सुनाएं

मिले हम को संगीं अलम कैसे कैसे,


मर्दों को मालूम क्या औरतों के

दिल में छिपे हैं मरम कैसे कैसे ! ....................

*****शिकायत********




हम को न खबर थी दुनिया में दिल की भी तिज़ारत होती है

आशिक के दिल में करूं ज़फ़ा ऐसी क्यों आदत होती है,



नादान उमर, दिल भोला था हम इश्क अचानक कर बैठे

मालूम हुआ है अब हम को ये प्यार भी आफ़त होती है,




माना हम मन्दिर मस्जिद में सज़दे न खुदा के करते हैं

हम प्यार जो सच्चा करते हैं ये भी तो इबादत होती है,




नामुमकिन है अन्दाज़-ए-अदा उन की उल्फ़त के जान सकें

उन के सपनों में न आयें तो हम से शिकायत होती है




लाखों चलते हैं, मगर मन्ज़िल कोई एक ही पाता है

न जाने क्या उन लोगों में ऐसी भी लियाकत होती है ! ..............

Monday, June 11, 2007

******तसव्वुर********




पल भर की खुशी और फिर ग़म का साया

ख्वाब में उनका आना और लौट जाना,


दीद की खुशी और मलाल हिज़ाब का

यूं उनका नज़र उठाना और झुका जाना,


वस्ल का अहसास और दर्द हिज़्र का

उनका हाथ मिलाना और चला जाना..........................

*****जिंदगी*******


जिंदगी जीने के काबिल नहीं

पर मौत से कुछ हासिल नहीं,


चारागर से क्या उम्मीद रखें

जब चराह से हम ही कायल नहीं,


फ़िरुंगा बे-फ़िक्र अर्सा-ए-आलम

अब कोई मेरा हामिल नहीं,



रोटी के चार हर्फ़,कुछ पन्ने किताबों के,

जिंदगी से कुछ और हासिल नहीं.

******रिहाई*******

धीरे से खुलती है परत खू-ए-यार की
अगाज़-ए-उल्फ़त मे रुसवाई नही होती,
आईना निभाता है बेबाक देहारी अपनी
अक्स से कभी हम-नवा-ई नही होती,
जोश कायदा है जिंदगी का
बहते पानी मे कभी काई नही होती,
आदमी का बस यही ग़म-ए-दौरान है
इश्क से कभी रिहाई नही होती !

Friday, June 8, 2007

*****खामोशी********


कुछ तो गुस्ताख़ियों को मुहलत दो,
अपनी पलकों को हम झुकाते हैं.

वो तो है दिल की नादानी,
जुर्म मुझसे कहाँ हुआ है वो.

जिसने रक्खा है कैद में मुझको,
खुद रिहाई है माँगता मुझसे.

वो मनाने तो आया मुझे,
रूठ कर ख़ुद गया है मगर..................

इन अहसासों से गुज़रते हुए दिल में एक खामोशी कहीं बहुत गहरे तक छिप कर बैठ जाती है, लेकिन कमाल है यह ख़ामोशी बोलती है, चुप रह कर बात करती है, वह बड़ी खूबी से इस बात का जि़क्र करते हुए कह रही है !

Wednesday, June 6, 2007

*****Manzar********




Manzar Hai Vahi Thathak Rahi Hoon.
Hairat Se Palak Jhapak Rahi Hoon.

Ye Tu Hai Ke Mera Veham Hai,
Band Aankhon Se Tujhko Tak Rahi Hoon.

Jaise ke Kabhi Na Thaa Taarruf,
Yuun Hee Milate hue Jhijhak Rahi Hoon.

Pehchaan Mein Teri Roshani Hoon,
Aur Teri Palak Palak Rahi Hoon.

Kyaa Chain Mila Hai Sar Jo Us Ke,
Shaanon Pe Rakhe Sisak Rahi Hoon.

Ik Umrr Huee Hai Khud Se Ladeten
Ander Se Tamaam Thak Rahi Hoon.

Ek Nacheez