
मेरे दर्द-ए-दिल की थी वो दास्तान, जिसे हंसी मे तुमने उडा दिया
जिसे बचाया था सम्भल सम्भल कर, वो दर्द तुमने जगा दिया
मुझे प्यार का शौक ना रहा, मेरे दोस्त भी है सब बेवफा
जो करीब आये तो ज़िक्र हुआ, जो दूर हुए तो भूला दिया
वो जो मिलते थे कभी रात मे, गिले होते थे उनकी हर बात मे
ना वो दिल रहा, ना वो दोस्त रहा, मैने ख्वाबो को भी सूला दिया
वो तो कहते थे हर बात मे, कि हम ही बसते थे उनकी ज़ात मे,
मै ना जान सकुंगी ये कभी, क्यों मुझको दिलसे भूला दिया.







