Saturday, October 20, 2007

******दर्द-ए-नायाब सी आँखें*************

दर्द-ए-नायाब की तस्मील है उसकी आँखें
आईना है तो कभी झील है उसकी आँखें

खुद मैं उस शख्स की तस्वीर बा-ज़हीर देखूं
मेरी आँखों मे जो तहवील है उसकी आँखें

गर मुमकिन है किसी तरह भटक जाऊं मैं
राह-ए-एहसास में क़ंदील है उसकी आँखें

हमने देखा है समंदर की तहों मे जाकर
दर्द-ए-इर्फान की ज़ंबील है उसकी आँखें

जिसकी तौजीब ना कर पायी हो किसी ने भी
इस मज़मूम की तस्फील है उसकी आँखें.

1 comment:

ashish said...

ek baarfir aapki urdu mujh par bhari padi puri baat samajh mein nahi aayee aur jitna maine guess kiya us hisab se ek baar fir baat dil ko chuti hai.............